|
|
|
Bin die Meere
abgefahren, |
|
hab im Ozean
getaucht, |
|
mit dem
Albatros geflogen, |
|
und keinem
mehr vertraut. |
|
War ganz oben
und tief unten, |
|
wo`s das Licht nicht mehr gibt. |
|
Hab mich
sinnlos oft betrunken |
|
und den
falschen Glanz geliebt. |
|
Hab im
Narrenschiff gesessen, |
|
flog den
Träumen oft voraus, |
|
war vom
Fernweh wie besessen |
|
|
|
Und war immer
unterwegs nach Haus. |
|
|
|
Sah
den blauen Planeten |
|
beinah
untergeh`n. |
|
Musste meinen
Stand vertreten, |
|
über sieben
Brücken geh`n. |
|
Ich liebe jede Stunde, |
|
ließ den
Schwanenkönig aus, |
|
zählte
täglich meine Pfunde |
|
|
|
Und war immer
unterwegs nach Haus. |
|
|
|
Mich
zwingt keiner auf die Knie, |
|
ich war König der Welt. |
|
Es ging weiter irgendwie |
|
ohne Zepter, ohne Geld. |
|
Bin die Meere abgefahren, |
|
hab im Ozean getaucht, |
|
mit dem Albatros geflogen |
|
|
|
Und
war immer unterwegs nach Haus. |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Hinweis: Der
hier aufgeführte Text entstammt keiner gedruckten Publikation, sondern
wurden von den Originalaufnahmen abgehört.
Für ihre hundertprozentige Richtigkeit kann deshalb keine Garantie
übernommen werden. |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|